एक कचौड़ी, दो समोसा… ऐसे नारों से नहीं, साथ से बनता है सभ्य समाज

 


एक कचौड़ी, दो समोसा… ऐसे नारों से नहीं, साथ से बनता है सभ्य समाज

“एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा…”
“एक सुट्टा, एक चाय, मर्द जात है हाय-हाय…”

ऐसे मज़ाकिया नारे सुनने में भले ही मनोरंजक लगें, लेकिन जब किसी पूरे वर्ग—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—को एक ही नजर से देखने की आदत बनने लगे, तो धीरे-धीरे समाज में दूरी और अविश्वास पैदा हो सकता है।

किसी एक व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर पूरे पुरुष समाज को गलत मानना उतना ही अनुचित है, जितना किसी एक महिला के व्यवहार के आधार पर सभी महिलाओं के बारे में धारणा बना लेना।

स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को आगे बढ़ाने और समाज को संतुलित बनाने के लिए बनाया है।

परिवार हो, कार्यस्थल हो या समाज—जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार और योगदान को समझते हैं, तभी स्वस्थ वातावरण बनता है।

स्त्री की संवेदनशीलता, पुरुष का सहयोग, स्त्री की क्षमता, पुरुष की जिम्मेदारी—इन सबका कोई निश्चित लिंग नहीं होता। हर व्यक्ति अपनी अलग खूबियों के साथ समाज में योगदान देता है।

मज़ाक और नफरत के बीच एक महीन अंतर है

हंसी-मजाक जीवन का हिस्सा है। महिलाओं पर बने चुटकुले हों या पुरुषों पर बने मज़ेदार नारे—यदि वे हल्के-फुल्के मनोरंजन तक सीमित रहें तो बात अलग है।

लेकिन जब मज़ाक बार-बार किसी पूरे वर्ग को नीचा दिखाने या अविश्वास की नजर से देखने का माध्यम बन जाए, तो हमें रुककर सोचना चाहिए।

हमें यह देखना चाहिए कि हमारी भाषा रिश्तों को जोड़ रही है या अनजाने में दूरी पैदा कर रही है।

समाज दूरी से नहीं, संवाद से मजबूत होता है

स्त्री और पुरुष के बीच अविश्वास बढ़ाने के बजाय हमें संवाद को बढ़ावा देना चाहिए।

अगर किसी पुरुष का व्यवहार गलत है, तो उसके व्यवहार की आलोचना होनी चाहिए—सभी पुरुषों की नहीं।

अगर किसी महिला का व्यवहार गलत है, तो उसके व्यवहार पर बात होनी चाहिए—सभी महिलाओं की नहीं।

व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होनी चाहिए, उसके स्त्री या पुरुष होने से नहीं।

एक बेहतर समाज की शुरुआत हमारी भाषा से होती है

हम अगली पीढ़ी को कैसा समाज देना चाहते हैं?

ऐसा समाज जहाँ लड़के लड़कियों को शक की नजर से देखें और लड़कियां लड़कों को शक की नजर से?

या ऐसा समाज जहाँ दोनों एक-दूसरे का सम्मान करें, सीमाओं को समझें और आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे का साथ दें?

शायद हमें अपने छोटे-छोटे मज़ाक और नारों पर भी थोड़ा विचार करना चाहिए।

क्योंकि शब्द छोटे होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव बड़ा हो सकता है।

स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं। दोनों मिलकर परिवार बनाते हैं, समाज बनाते हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बनाते हैं।

इसलिए नारा ऐसा हो जो दूरी नहीं, रिश्ता बनाए—

“नारी हो या पुरुष महान, दोनों से बनता हिंदुस्तान।”

“सम्मान मिले दोनों को समान, तभी बनेगा सभ्य समाज महान।”


Comments

Popular posts from this blog

पुरुष के खर्राटे स्त्री के संस्कारों का फल होते हैं, क्योंकि

गैस चूल्हा जलने पर कितने वॉट की ऊर्जा होती है? गैस और इंडक्शन की हीट पावर समझें

राजस्थान के गंगानगर की घटना: आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है?