काश, पितृपक्ष की तरह हमारे पितर भी लौटकर आते…
काश, पितृपक्ष की तरह हमारे पितर भी लौटकर आते…
हर साल पितृपक्ष आता है और हमें अपने उन अपनों की याद दिलाता है, जो अब इस दुनिया में हमारे साथ नहीं हैं।
कभी-कभी मन में एक अजीब-सी इच्छा होती है—काश, पितृपक्ष की तरह हमारे पितर भी सचमुच लौटकर आते… कुछ दिनों के लिए ही सही।
काश, हम फिर से उनके सामने बैठ पाते।
उनकी आवाज़ सुन पाते।
उनका हाथ पकड़ पाते।
उनसे कह पाते कि उनके जाने के बाद भी हम उन्हें भूले नहीं हैं।
काश, माँ फिर से पूछतीं—“खाना खाया?”
पिता फिर से समझाते—“चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।”
दादा-दादी फिर अपनी पुरानी बातें सुनाते और हम बिना घड़ी देखे उन्हें सुनते रहते।
हम जानते हैं कि बीता हुआ समय वापस नहीं आता और जो लोग हमें छोड़कर चले गए, वे उसी रूप में हमारे पास लौटकर नहीं आ सकते। लेकिन उनकी यादें जरूर लौटती हैं—कभी किसी खुशबू में, कभी किसी गीत में, कभी किसी पुराने सामान को देखकर और कभी अचानक बिना किसी वजह के।
शायद पितृपक्ष का सबसे सुंदर अर्थ यही है कि हम अपने पूर्वजों को केवल एक रस्म के रूप में नहीं, बल्कि कृतज्ञता और प्रेम के साथ याद करें।
क्योंकि कुछ रिश्ते मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होते।
वे हमारे व्यवहार में, हमारी आदतों में, हमारी बातों में और हमारी यादों में जीवित रहते हैं।
काश, पितृपक्ष की तरह हमारे पितर भी लौटकर आते…
हम उनसे मिलते, उन्हें देखते और बस इतना कहते—
“आप गए जरूर हैं, लेकिन हमारे दिल से कभी गए नहीं।”

Comments
Post a Comment