शिकरपुरी समाज द्वारा लोहड़ी (लाला लोई) का यादगार आयोजन
मैंने शिकरपुरी समाज के सभी सदस्यों के साथ मिलकर लोहड़ी का पर्व बड़े प्रेम, हर्ष और उल्लास के साथ मनाया। हमारे समाज में इस पर्व को लाला लोई भी कहा जाता है। यह आयोजन 13 जनवरी को शाम 7 बजे रखा गया था, जिसकी जानकारी पहले ही सभी सदस्यों को दे दी गई थी। निर्धारित समय पर समाज के सभी सदस्य अपने-अपने परिवारों के साथ कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने लगे। सभी ने एक-दूसरे को लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं और प्रेमभाव से मिले। पूरे शिकरपुरी समाज का वातावरण अत्यंत सौहार्दपूर्ण और सकारात्मक था। हर चेहरे पर खुशी और अपनापन साफ़ दिखाई दे रहा था।
लोहड़ी कार्यक्रम की व्यवस्था समाज भवन के बाहर की गई थी। लकड़ियाँ पहले से ही एकत्रित कर ली गई थीं। समाज के प्रमुख और वरिष्ठ सदस्यों द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की गई और इसके बाद लोहड़ी को अग्नि दी गई। इस पवित्र अग्नि के साथ मानो पुरानी शिकायतों, मतभेदों और नकारात्मक भावनाओं का अंत हुआ और सभी ने नई सोच, नई ऊर्जा और नई शुरुआत का अनुभव किया। ऐसा लग रहा था जैसे इस अग्नि के साथ मन के सभी बोझ भी जलकर समाप्त हो गए हों और किसी के मन में किसी के प्रति कोई गिला-शिकवा न बचा हो।
इसके बाद पूरा माहौल उत्सव में बदल गया। ढोल की गूंजती हुई आवाज़ों पर सभी सदस्य मस्ती में झूमने लगे। बच्चे, युवा और बुज़ुर्ग—सभी ने लोहड़ी के इस सामूहिक आयोजन का भरपूर आनंद लिया। यह समय पूरे शिकरपुरी समाज के लिए एकता, भाईचारे और खुशी का प्रतीक बन गया। हर कोई खुलकर हँस रहा था, बातें कर रहा था और इस पर्व को यादगार बना रहा था।
कार्यक्रम के दौरान सभी को तिल और गुड़ का प्रसाद वितरित किया गया, जो लोहड़ी पर्व की मिठास और शुभता का प्रतीक है। इसके पश्चात भोजन की भी सुंदर व्यवस्था की गई थी। सभी सदस्यों ने प्रेम और प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण किया और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हुए इस आयोजन को पूर्ण किया। अंत में सभी सदस्य खुशी और संतोष के भाव के साथ अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए।
मैं हृदय से शिकरपुरी समाज के सभी वरिष्ठ सदस्यों की आभारी हूँ, जो इस प्रकार के सामूहिक आयोजनों के माध्यम से समाज के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के और करीब लाते हैं। ऐसे आयोजन न केवल हमारी परंपराओं को जीवित रखते हैं, बल्कि समाज में प्रेम, एकता और आपसी सद्भाव को भी मजबूत बनाते हैं।
Comments
Post a Comment